sita vanvaas

अवध में कैसे पाँव धरूँ!

वनवासिनी पुन: रानी का कैसे स्वाँग भरूँ!

 

‘जिस घर से कलंक ले सिर पर

कभी निकल आयी मैं बाहर

उसमें अब फिर से प्रवेश कर

लज्जा से न मरूँ!

 

‘दुखमय है कुल गाथा मेरी

बीत गये युग देते फेरी

प्रिय इतनी अब रात अँधेरी

रवि को देख डरूँ

 

‘मन को पति-चरणों से जोड़े

अब मैं हूँ जग से मुँह मोड़े

कोई व्यंग्य-बाण फिर छोड़े

क्यों यह सहन करूँ

अवध में कैसे पाँव धरूँ!

वनवासिनी पुन: रानी का कैसे स्वाँग भरूँ!