sita vanvaas

नाम लेते जिनका दुख भागे

मिला उन्हें तो जीवन-भर दुख ही दुख आगे-आगे

 

छूटा अवध साथ प्रिय-जन का

शोक असह था पिता-मरण का

देख कष्ट मुनियों के मन का

वन के सुख भी त्यागे

 

वन-वन प्रिया-विरह में फिरना

‘कैसे हो सागर का तिरना?’

भ्राता का मूर्छित हो गिरना

नित नव-नव दुख जागे

 

गूँजी ध्वनि जब कीर्ति-गान की

फिर चिर-दुख दे गयी जानकी

माँग उन्हीं-सी शक्ति प्राण की

मन! तू सुख क्या माँगे!

नाम लेते जिनका दुख भागे

मिला उन्हें तो जीवन-भर दुख ही दुख आगे-आगे