alok vritt

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‘जन्मसिद्ध अधिकार मनुज का न्याय-शान्ति पाने का
स्वतंत्रता का, सुख का, जीने का, हँसने-गाने का
अवसर की समता का, मनचाहे जीवन-यापन का
आत्मोन्नति का, आत्मा में परमात्मा के दर्शन का
तब कैसे ये कोटि-कोटि जन दास बने जीते हैं
अमृत निकाल बाँट देते जो, आप गरल पीते हैं
किसने छीन लिया इनका अधिकार मनुज रहने का?
कैसे बन अभ्यास गया अपमान-घृणा सहने का?’

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करता था विचार यों बैठा एक पथिक एकाकी
घूम रही थी नयनों में कुछ पल पहले की झाँकी
गोरे यात्री ने जब था गाड़ी से उसे उतारा
नीति-न्याय अधिकार गये थे कुचले बल के द्वारा

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‘करूँ भविष्यत् की चिंता क्यों जो अजान, अश्रुत है!
मुझको एक चरण अगला ही दिखता रहे, बहुत है
आज दिये की लौ-सा वह मुझको दिखलाई पड़ता
वर्ण-भेद का कंटक यह जो पाँवों में है गड़ता
इस काँटे को बिना निकाले यदि आगे बढ़ जाऊँ
तो मैं भी अत्याचारों का पोषक क्यों न कहाऊँ!
धिक् मानव जो केवल धन के लिए जिये, मर जाये!
धिक् जीवन जो अपमानों में सुख की सेज बिछाये
स्वाभिमान-स्वातंत्र्य-रहित वैकुण्ठ नहीं अच्छा है
प्रोमिथियस मुक्तात्म सुलगता रहे, कहीं अच्छा है ‘
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‘पशुबल के सम्मुख आत्मा की शक्ति जगानी होगी
मुझे अहिंसा से हिंसा की आग बुझानी होगी
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‘प्रेम सृष्टि का मूल धर्म, चेतन का नियम सनातन
इसके कारण ही विनाश से बचा आज तक जीवन
यदि धारा बहती न प्रेम की जननी के अंतर में
केवल पय से बच पाता मानव-शिशु विश्व-समर में!
यही प्रेम की महाशक्ति लेकर मैं आज बढूँगा
छोड़ूँगा न इसे ईसा-सा सूली भले चढूँगा
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‘जिनपर मेरा सतत नियंत्रण रहें विमल वे साधन
साध्य अभिन्न सदा उनसे, जिस तरह कार्य से कारण
व्यर्थ लक्ष्य का सोच, सही पथ, गति यदि सुदृढ़ चरण में
गति से भिन्न नहीं कोई गंतव्य कभी जीवन में’

अन्धकार बाहर, कितना भी हिम-प्रवाह चलता था
यह विचार का तेज हृदय में दीपक-सा जलता था
अरुणिम सूरज उगा नये जीवन का, नयी ऊषा का
वर्ण-द्वेष की काल-निशा में सहसा हुआ धमाका

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