anbindhe moti

जीवन-धर्म

जीवन-धर्म निभाना होगा
सिर पर पड़े पहाड़ दुखों का, फिर भी हँसना-गाना होगा

जान रहे जानेवाले का लौट नहीं फिर आना होगा
कौन मरा मृत के सँग लेकिन, रो-धो चुप हो जाना होगा
ज्ञात नहीं कल की आँधी में किसका कहाँ ठिकाना होगा
फिर भी गति जब तक चरणों में, तब तक चलते जाना होगा
सृष्टि लाँघता मृत्युंजय भी प्रेम किसीका, माना, होगा
किंतु भाग्य से लोहा लेना ज्यों दीपक-परवाना होगा
दाना होने से दुनियां में और अधिक पछताना होगा
बुद्धि करेगी नृत्य वृथा ही, अंत वही मनमाना होगा

जीवन-धर्म निभाना होगा
सिर पर पड़े पहाड़ दुखों का फिर भी हँसना-गाना है

1943