kavita

मैं तुम्हें देखता ही रहता

नयनों में अविरल नयन डाल

छू  अरुण अधर छवि-किरण-माल

पलकों में पल पल पुलक-जाल

साँसों में सौरभ वन बहता

 

वन-वन वसंत का अल्हड़पन

कण-कण में इठलाता यौवन

तुम चिर-नवीन, तुम चिर-नूतन

प्रति-रोम विकल, विह्वल कहता

 

क्षण-बद्ध युगों के चपल चरण

दृग-पुलिनों में अनजान किरण

रे भर जाती अनंत जीवन

मैं मधुर विकलता बन बहता