kavita

कैसे तब बँधेगी आस

कलि -कुसुम मुरझा जायेंगे

अलि -दल न गाने पायेंगे

जब अंक में पतझर के खो जायेगा मधुमास

 

तरु-दीप भी बुझ जायेंगे

तारे न अश्रु बहायेंगे

क्या देख रजनी में करेंगे ज्योति का विश्वास

 

स्मृति भी न मन में आएगी

रो आँख भी थक जाएगी

कैसे करूँगा व्यक्त तब अपने ह्रदय की प्यास

कैसे तब बँधेगी आस