रेत पर चमकती मणियाँ_Ret Par Chamakti Maniyan

  1. अधिक दिनों तक जीना भी 
  2. अपने कुल की मर्यादा भुलाकर  
  3. अपने पुरुषार्थ का अर्जन ही 
  4. अव्यक्त को किसी व्यक्त के माध्यम से ही 
  5. अस्वीकृति कि सीमा कहाँ तक है 
  6. आगे-पीछे, दायें-बायें 
  7. आत्महत्या करने के पूर्व कोई भावुक किशोर 
  8. आपको तो सदा आगे ही आगे बढ़ना है  
  9. ओ मेरे मन ! देखना है तेरा गर्व 
  10. इन अनंत-अनंत रूपों में 
  11. एक अगला कदम ही यथेष्ट है मेरे लिए 
  12. एक वह कलाकार है  
  13. अँधेरा कहाँ है? 
  14. आँखें बंद करके आप किसी भी बांकी चितवन के 
  15. कसता जा रहा है प्रकाश का घेरा 
  16. कुछ समस्याओं के समाधान के लिए तो 
  17. कुछ ज्ञान, कुछ भावना   
  18. कोई कितनी भी आड़ क्यों न लगाये 
  19. कोयल को यह चिंता कब सताती है 
  20. चमत्कार नहीं होगा 
  21. चिन्तक के लिये अद्भुत  
  22. जब तक ह्रदय में 
  23. जब तक जरा-सी भी साँस रहती है 
  24. जहर को पीना ही नहीं, पचाना पड़ता है,  
  25. जीवन एक कला है 
  26. जीवन क्या है 
  27. जीवन महान है 
  28. जीवन सीधी नहीं वर्तुल रेखा है 
  29. जीवन हमें इठलाने का अवसर नहीं देता है  
  30. जो धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे हैं 
  31. जैसे निद्रा के पूर्व 
  32. जो सपनों में नहीं जीता है 
  33. तेरे समाप्त कह देने से ही 
  34. देश और काल ही नहीं 
  35. दो कवियों की आपस में तुलना नहीं करनी चाहिये 
  36. पत्तों के झड़ जाने से 
  37. पत्र और शाखाएं छांटने से क्या होगा ! 
  38. पहले तो जीवन के अनमोल मोती  
  39. प्रभात में चिड़ियों का चहकना अच्छा लगता है 
  40. फूल को तेजी से खिलते देखकर 
  41. फूलों की सेज पर सोते रहने से 
  42. बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखते हुए ही 
  43. बड़ी मोहक लगती है 
  44. बाग में एक स्थान पर बैठ कर 
  45. मस्तक पर छात्र और किरीट धारण कर लेने से ही 
  46. माना कि विचार विद्युत्-से चमक कर 
  47. माना कि अपना सबकुछ लुटाकर 
  48. मेरा कुल पढ़ा-लिखा व्यर्थ हो गया 
  49. मैं उम्र में शेक्सपियर से बड़ा हो गाया हूँ 
  50. यदि कोई झोली न फैलाये 
  51. यदि सेवा करने के बाद 
  52. यदि बचपन में बाँधी प्रेम की डोर  
  53. यह सच है कि हम धरती को  
  54. यह सत्य है कि हमें धरती से  
  55. यह संसार 
  56. यात्रा का उल्लास तभी तक है 
  57. यों तो बाग़ का एक-एक फूल 
  58. रेत पर चमकती मणियाँ 
  59. विद्या, बुद्धि और चरित्र का सम्मान ही 
  60. सागर कि क्षारता-हरण करने को निकली गंगा 
  61. सागर के ज्वर पर थिरकने के बाद 
  62. सारी आयु हम अपने ही विचारों की कैद में रहते हैं 
  63. सूरज, चाँद और तारे ही नहीं 
  64. सोने की पत्तरों से मढ़ देने से ही 
  65. संग्रह करते जाना तो नशा है 
  66. संत वही है 
  67. हर फूल के मूल में कोई काँटा छिपा है 
  68. हरित-तृण चरते गलि-पशु के लिए 
  69. हिमपात में भी 
  70. हे कविता-रवि ! 
  71. हे भर्त्रहरि